बुधवार, 16 मई 2018

देश के प्रधान सेवक को देश के मामूली सेवक का पत्र...




प्रधानमंत्रीजी,
नमस्कार।

आज हमें आपसे मन की बात कहने का मन है, बल्कि मन बड़ा उद्वेलित है इसलिए कहना पड़ रहा है। माननीय प्रधानमंत्रीजी, जब आप किसी मंच से सवा सौ करोड़ देशवासियों कहकर संबोधित कर रहे होते हैं तब उसमें एक हम भी संबोधित हो रहे होते हैं, आपको बड़े गौर से सुन रहे होते हैं। बस थोड़ा समय दीजिए और हमें भी गौर से सुन लीजिए। जी, प्रधानमंत्रीजी, हम देश की जनता बोल रहे हैं। सुन लीजिए!

आज आपकी सरकार के एक आदेश ने हमें आपकी सोच के बारे में सोचने पर विवश कर दिया है। आपकी सरकार ने आदेश दिया है कि रमजान शुरू होने से लेकर अगस्त में अमरनाथ यात्रा संपन्न होने तक आतंकियों के खिलाफ संघर्ष अभियान नहीं चलेगा। प्रधानमंत्रीजी, क्या यह निर्णय सही है? क्या यह आदेश देशहित में है? अक्सर मन की बात करने वाले प्रधानमंत्रीजी, मन को साफ कर बताइए, अक्सर चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्रीजी, बिल्कुल सच बताइए कि यह आदेश क्या वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित नहीं है? क्या यह निर्णय कश्मीर में रोज देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले जवानों की शहादत का अपमान नहीं है? क्या यह एकतरफा संघर्ष विराम देश की सुरक्षा के लिए लड़ रहे सैनिकों को मौत के मुंह में धकेलने जैसा नहीं है जबकि किसी भी आतंकी संगठन ने हथियार डालने की घोषणा नहीं की है; उल्टे लश्कर—ए—ताइबा ने डराया ही है?

प्रधानमंत्रीजी, जवानों को निर्देश है कि वे रमजान के महीने में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन नहीं चलाएंगे। माने क्या करेंगे? आतंकी जब गोलियां चलाएंगे; तब वंदेमातरम कहते हुए शहीद हो जाएंगे क्योंकि आपके लिए उनकी जान से अधिक 2019 में होने वाले चुनाव की फिक्र है? सच बताइए। 56 इंच का सीना है आपका लेकिन उस सीने में दिल—विल तो है ना? धड़कता तो है ना? ​य​ह निर्णय दिल से ही किया है ना? या सत्ता का धूर्त दिमाग, देशप्रेम वाले दिल पर हावी हो गया है? सच बताइए...।

प्रधानमंत्रीजी, अक्सर चर्चा होती है कि आतंक का तो कोई धर्म नहीं होता और यकीनन नहीं होता है क्योंकि हमारी परंपरा है कि हम धर्म को महज किसी मजहब का नाम नहीं समझते हैं; हम धर्म को सत्य का पर्याय समझते हैं और अधर्म को झूठ का, गलत का। इस तरह भारतीय संस्कृति इस बात को सुनिश्चित करती है कि जो गलत है, वह धर्मविरूद्ध है; जो सही है, सिर्फ वही धर्म है। प्रधानमंत्रीजी, धर्म और आतंक का अर्थ स्पष्ट होने के बाद भी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उसमें शामिल आप तक के इस निर्णय को हम किस रूप में देखें कि रमजान में आतंकियों के खिलाफ अभियान नहीं चलेगा?

नरेंद्र दामोदारदास मोदीजी, आप अक्सर अपनी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया करते हैं फिर तो उनके समय की बातें भी याद होंगी आपको, या भूल गए? इस बात की क्या गारंटी है कि सेना चुप बैठ जाएगी तो आतंकी भी हथियार रखकर रमजान में नमाज पढ़ने बैठ जाएंगे जोकि मंदिरों के साथ मस्जिदों में भी बम विस्फोट करते समय नहीं सोचते? याद कीजिए 18 साल पहले की घटना। 2000 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और उन्होंने आतंकियों के विरूद्ध लड़ाकू अभियानों की शुरुआत नहीं करने की घोषणा कर दी थी। उस घोषणा के चार महीनों के दौरान आतंकियों ने श्रीनगर एयरपोर्ट पर बड़ा हमला किया था। लश्कर—ए—ताइबा के छह आतंकियों के हमले में दो जवान और दो नागरिक मारे गए थे और घाटी में सक्रिय सभी आतंकी गुटों ने सरकार के प्रस्ताव को ठुकराया दिया था। आतंकी कश्मीर में खुलेआम घूम रहे थे...। आप बताइए, इस बात की क्या गारंटी है कि हालात फिर से नहीं दोहराए जाएंगे? माननीय, संघर्ष विराम का यह निर्णय लेते समय आपने चाहे अपना सीना 56 इंच से भी अधिक फुलाने की कोशिश की हो लेकिन इसे आपकी बुजदिली ही मानी जाएगी, बहादुरी नहीं। आप बताइए ना कि आतंक के सामने हथियार डाल दिए जाने के आपके निर्णय को किस रूप में देखें जबकि पिछले साल रमजान के दौरान करीब 80 फीसदी हिंसा की घटनाएं हुई थीं और ज्यादातर मुठभेड़ स्थलों पर आतंकियों के बचाव के लिए मुस्लिम नागरिकों को ढाल बनते देखा गया था। आठ अमरनाथ यात्रियों की मौत भी भूल गए क्या? यदि याद है तो फिर अमरनाथ यात्रा यह एकतरफा संघर्ष विराम क्यों?

प्रधानमंत्रीजी, आप देश में इस समय हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे हैं। कुछ लोग तो आपको हिंदू हृदय सम्राट भी कहते हैं तो बताइए ना कि क्या हिंदुओं के हृदय का सम्राट ऐसा होता है? इस देश में जब महज आरोप लगने पर मन्दिरों में घुसकर, पूजा से उठाकर, घरों में जाकर, सोते से जगाकर भी कई हिन्दू सन्तों को गिरफ्तार करने में पुलिस नहीं हिचकी है जबकि उनमें से कई बाद में बेगुनाह भी साबित हुए, ऐसे में आतंकियों के खिलाफ उनका धर्म देखकर कार्रवाई रोक देना क्या सही है? यह निर्णय आप हिंदू बनकर किए हैं? या सरकार बनकर? सही बताइए, हमें तो यह दोनों में से किसी का नहीं, सिर्फ एक मौकापरस्त नेता का निर्णय लग रहा है। क्या आपने हिंदुओं को खुश करने के लिए भी कभी कोई ऐसा आदेश दिया कि नवरात्र तक किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं होगी? फिर, हिंदू सम्राट का मुस्लिम प्रेम का यह ढोंग क्यों? सच बताइए, 2019 का चुनाव नजदीक है इसलिए ना!

प्रधानमंत्रीजी, संविधान में धर्मनिरपेक्ष देश है अपना। सभी धर्मों के पर्व—त्योहारों पर उस धर्म के लोगों का विशेष ख्याल किया जाना चाहिए। निश्चित ही, सरकार को ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि रमजान में न किसी मुसलमान को दिक्कत हो, न नवरात्र में किसी हिंदू को लेकिन सवाल यह है कि आप कश्मीर के आतंकियों को आतंकी की जगह, मुस्लिम के रूप में क्यों देख रहे हैं? प्रधानमंत्रीजी, जो आतंकी होगा वह क्या रमजान के महीने में अल्हा का नेक बन्दा हो जाएगा? वह जो आतंक को ही धर्म मान चुका है, उसके प्रति यह प्रेम क्यों? माननीय, आपके इस निर्णय से एक तरफ तो देश में यह संदेश जा रहा है कि मुस्लिम आतंकी होते हैं तो दूसरी तरफ यह भी कि मौके जब चुनाव के हों तो आप जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई भी दांव चल सकते हैं, भले ही वह देशविरूद्ध हो। आप बताइए ना, जो सरेआम बच्चों पर पत्थर बरसाते हैं, तीर्थयात्रियों को मौत के घाट उतार रहे हैं, जिनके हाथ असंख्य कश्मीरी पंडितों के खून से रंगे हैं, जो हर धर्म वालों को मिटाकर सिर्फ अपना कथित जिहाद जिंदा रखना चाहते हैं, वे आपको रमजान पर नमाज पढ़ने वाले लगते हैं क्या? वे आपको पत्थरबाज, आतंकी नहीं, बल्कि मुस्लिम दिखते हैं क्या? वे जब किसी निर्दोष नागरिक या देश की सुरक्षा में लगे कर्तव्यनिष्ठ जवान को मारने के बाद यदि हथियार रखकर नमाज भी पढ़ रहे होंगे, तब क्या कश्मीर कल्याण- देश कल्याण की दुआ मांग रहे होंगे? बिल्कुल नहीं! वे आतंक कायम रहे की बात ही दोहरा रहे होंगे... ।

प्रधानमंत्रीजी, हम देश के नागरिक हैं, देश के सेवक हैं लेकिन आप तो प्रधानसेवक हैं फिर आपकी सेवकाई में इतना दोष क्यों? आप तो सरकार हैं, आपके पास आतंक के सबसे पुष्ट आंकड़े हैं, फिर सुरक्षा से समझौता क्यों? आतंकवादियों के प्रति यह दरियादिली क्यों? 1990 में जबसे कश्मीर में आतंक का दौर शुरू हुआ, तब से अब तक 13978 नागरिकों की आतंकी हमलों में जान जा चुकी है। यह जानकारी आपही की सरकार ने हालही में एक आरटीआई कार्यकर्ता रोहित चौधरी को दी है। इसमें गृह मंत्रालय ने माना है कि आतंकी हमलों में 5123 सुरक्षाकर्मियों की जान भी गई है। प्रधानमंत्रीजी, यकीन नहीं होता कि आप महज सत्ता के लालच में 5123 जवानों की जान का इस तरह सौदा करेंगे...। विनती है कि कृपया वोट के लिए देश का सौदागर बनने से बचिए।

प्रधानमंत्रीजी, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय आपकी कई रैलियों में हमने आपको सुना था। तब हम छपरा में थे। हमें याद है कि कांग्रेस की सरकार थी और जवानों की हत्या के बाद आतंकी उनके सिर काट ले गए थे। छपरा स्थित एयरपोर्ट के मैदान पर आप गरज रहे थे कि यदि मेरी सरकार आई तो किसी जवान का सिर काटना तो दूर, उसकी तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकेगा। सच बता रहे हैं, आपका भाषण सुनकर मेरे अंदर देशप्रेम का रक्त प्रवाह अचानक बढ़ गया था। देशप्रेम रगों में तेजी से दौड़ने लगा था। जवानों के साथ हुई उस नाइंसाफी और उसके बाद मौन—मनमोहन सरकार पर हमें भी बहुत गुस्सा आया था और तब हमने मन ही मन तय किया कि आपको जरूर वोट देंगे। देश में ऐसी मजबूत सरकार लाएंगे जो आतंक का नामोनिशान मिटा दे और देश के अंदर हम नागरिक ही नहीं, सीमा पर हमारे जवान भी सुरक्षित रहें। यूपी से होने और बिहार में होने के कारण हम वहां के वोटर नहीं थे। सिर्फ आपको वोट देने के लिए हमने अपनी पत्रकारिता की तमाम पैरवियां लगा दीं, अपने तमाम परिचितों से आग्रह किया और वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाए। हमने वोट किया लेकिन आज आपने उसी भावना पर चोट किया। आज हम आहत हैं कि ये हमने किसे चुन लिया? अखिल भारत में सिर्फ भाजपा का परचम लहराने वाले एक प्रचारक को? सरकार बनाने के लिए चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले को? हम जैसे राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को भरमाने के लिए सभाओं में 56 इंच सीना फुलाने वाले को और देश की तमाम समस्याओं के मोर्चों पर सीना सिकुड़ा लेने वाले को? कश्मीर में पंडितों को बसाने का वादा कर, रोहिंग्याओं को बसाने वाले को? आतंक को धर्म समझने वाले को? या सत्ता को ही अपना सर्वस्व समझने वाले को?

प्रधानमंत्रीजी, आपने आतंक पर मनमोहन के मौन से हमें डराया था और हमारा वोट पाया था लेकिन अभी आप क्या कर रहे हैं? आपके शासनकाल में बीते तीन वर्षों में जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की 4,799 घटनाएं हुईं जिनमें दो सुरक्षाकर्मियों की मौत भी हो गई। गौर कीजिए कि आपकी सरकार ने ही राज्यसभा में यह आंकड़ा दिया था। लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने कहा था कि 2015 में पत्थरबाजी की 730, 2016 में 2,808 और 2017 में 1,261 घटनाएं दर्ज की गई हैं। बताइए ना, यह कब थमेगा? और यह भी बताइए ना कि आप इन घटनाओं पर मौन क्यों हैं? जबकि बाकी सभी मुद्दों पर बोलते हैं? यह भी बताइए कि इसके लिए कौन दोषी है, क्योंकि देश की सारी समस्याओं के लिए आप बताते हैं कि कौन दोषी है...।

प्रधानमंत्रीजी, कहां तो आतंक मिटाने का वादा था और कहां आप उससे ही गठजोड़ कर बैठे। आपके होते हुए जम्मू कश्मीर सरकार ने पत्थरबाजी के 9,730 मामले वापस ले लिए और आप देखते रहे? प्रधानमंत्रीजी, यह मेरे आंकड़े नहीं हैं, यह जानकारी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में दी थी और वह भी लिखित में। दो साल में पत्थरबाजी की छोटी घटनाओं में शामिल 4000 से ज्यादा लोगों के लिए माफी की सिफारिश की गई है। पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए पहली बार आरोपियों की पहचान उजागर नहीं की गई है। यह क्या है? पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा? अरे, वादा तो नागरिकों की सुरक्षा का था ना! सच बताइए, पत्थरबाजों से लेकर आतंकियों तक पर आपका दिल कब आया? अब तो आपकी सरकार को पत्थरबाजों पर पैलेट गन से वार करना भी अच्छा नहीं लगता, क्यों सच है ना? सुना है कि पैलेट गन नहीं, अब पत्थरबाजों पर घाव नहीं करने वाली प्लास्टिक की बुलेट चलाई जाएंगी? सवा सौ करोड़ नागरिकों की समस्याओं, उनके दर्द से जो आहत नहीं हैं, उनके दिल में पत्थरबाजों के लिए इतना दर्द क्यों है? बताइए ना!

प्रधानमंत्रीजी, वादा तो यही था ना कि यदि एक जवान भी मरा तो आप दस मारेंगे? और हकीकत क्या है? साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल तो आप जान ही रहे हैं ना! पंजाब के पूर्व जांबाज पुलिस अफसर केपीएस गिल ने इसे शुरू किया था। पोर्टल की रिपोर्ट साफ कह रही है कि सुरक्षा बलों की जम्मू कश्मीर में और नियंत्रण रेखा, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शहादत बढ़ रही है। आपका केन्द्रीय गृहमंत्रालय तो इतना घबराता है कि शहादत का आंकड़ा ही नहीं बताता। मंत्रालय की रिपोर्ट में 2011-13 के दौरान 239 और 2014-2017 के दौरान 368 आतंकियों के मारने का दावा है लेकिन सुरक्षा बलों की शहादत की संख्या का आंकड़ा नहीं है। हां, साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल पर इसके भी आंकड़े हैं। इसकी रिपोर्ट में साफ है कि पहले एक सुरक्षा बल का जवान शहीद होता था तो तीन आतंकी मारे जाते थे और अब एक जवान की शहादत पर दो आतंकी मारे जा रहे हैं। आम नागरिकों के मारे जाने का अनुपात करीब-करीब जस का तस है। पिछले साल 28 मई तक 25 नागरिक जम्मू-कश्मीर में हिंसा-आतंकवाद की भेंट चढ़े, 25 जवान शहीद हुए और आतंकी मारे गए 60। यानी दो आतंकियों को मारने के लिए एक जवान को मरना पड़ रहा है...। क्या खाक आप जवानों की चिंता कर रहे हैं?

प्रधानमंत्रीजी, हम ढूंढ रहे हैं, उस शख्स को जो 2014 के चुनाव के समय दिखा था। हमें बताइए कि चुनाव के दौरान आतंक के खिलाफ गरजने वाला वह शेर बचा भी है या मर गया? और इन चार वर्षों के बीच की वह तारीख भी बताइए, जब सत्ता के लिए आतंक से समझौता करने वाला यह बुजदिल पैदा हुआ? प्रधानमंत्री जी, किसी निर्दोष व्यक्ति को धर्म के आधार पर निशाना बनाना जितना गलत है, उतना ही गलत है उसके धर्म को देखकर उसके अपराध, आतंक को शह देना। इस तरह धर्म, जाति के आधार पर किसी का आतंक, अपराध बर्दास्त करने का चलन चल पड़ा तो हर राज्य में कश्मीर जैसे हालात होंगे। आग्रह है कि यह आदेश तत्काल रदद् कीजिए। आतंक मिटाने का अपना वादा पूरा कीजिए, नहीं तो चूड़िया ही पहन लीजिए; ताकि जब शहीदों की विधवाएं अपनी चूड़ियां तोड़ रही होंगी तब आप अपनी चूड़ियां खनकाते रहिएगा...।

रविवार, 13 मई 2018

अम्मा...


सभी माताओं को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। मेरी अम्मा को छोड़कर, क्योंकि अम्मा फेसबुक पर नहीं हैं। हां, उनकी नजर हर उस जगह है, जहां उनके बेटे की पहुंच है। यहां भी यदि हमने कुछ गलत लिखा तो वह जरूर भाई—बहन के माध्यम से उन तक पहुंच जाएगा और उसके बाद कोई तूफान आने जैसी चेतावनी मौसम विभाग की तरह जारी कर देंगी।
मेरी अम्मा देश की अधिकतर महिलाओं की तरह एक साधारण महिला और अधिकतर मांओं की तरह असाधारण मां हैं। वह फेसबुक पर नहीं हैं लेकिन वह तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हैं, ऐसा भी नहीं हैं। दरअसल, वह होना नहीं चाहतीं। वह ऐसी मां हैं, जो वह सबकुछ सीख सकती हैं जो उनके बेटे के लिए हो; अपने लिए बस एक ऐसा बेटा रखती हैं जिसपर वे गर्व न कर सकें तो लज्जा भी न आए। इस फेसबुक पर जहां नहीं होने पर आजकल लोग किसी को गंवार भी समझ जाते हैं, यहां यदि हम एक शब्द भी लिख पाते हैं तो उसे सिखाने की शुरुआत अम्मा ने ही की थी; यह हम कैसे भूल सकते हैं? अम्मा निश्चित ही मातृ दिवस जैसे आयोजनों को नहीं समझतीं क्योंकि यह उनके समझने के लिए हैं भी नहीं, यह हमारे लिए हैं। उनके समझने के लिए जो कुछ भी है, वह— वह सबकुछ समझती हैं। अम्मा से आज भी बात हुई लेकिन मातृभाषा— भोजपुरी में ही। वैसी ही बातचीत जैसी अन्य दिनों होती है। 'अम्मा गोड़ लागsतानी' से शुरुआत और 'अच्छा प्रणाम' कहने के बाद 'खूब खुश रहs' सुनकर समाप्त। इस तरह की बातचीत में हैप्पी मदर्स डे या मातृदिवस की शुभकामनाएं कहना ऐसा लगता है जैसे मां—बेटे की बातचीत में कहीं कोई और आ टपका हो, ऐसा जैसे ये शब्द कहीं से जबरदस्ती घुसेड़ दिए गए हों। इसलिए हम मातृदिवस कीअम्मा को शुभकामनाएं नहीं देते। हां, यदि माँ पर लिखने बैठें तो हजारों पन्ने लिख सकते हैं और उसके केंद्र में निश्चित वही अम्मा होंगी। वह हमें एक—एक शब्द के लिए प्रेरणा दे रही होंगी।
आज कई आधुनिक मम्मियों ने पोस्ट किए हैं। उनमें अपने ममत्व से अधिक श्रेष्ठता साबित करने की होड़ है और वह भी किससे? मां से ही। आज की कुछ नई मम्मियों ने कल की अम्माओं से खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की है जबकि वह खुद उन्हीं जैसी की संतान हैं। यह बहुत बुरा लगा हमें क्योंकि एक मां की दूसरी मां से कभी तुलना नहीं हो सकती है। हां, एक दौर से दूसरे दौर की तुलना जरूर की जा सकती है। और यदि उस दौर से आज के दौर की तुलना की जाए तो निश्चित मानो की तब की अम्मा ने आज की मम्मी से हजार गुना अधिक संघर्ष किया है। इसलिए कि तब हर मोड़ पर लड़ना होता था, आज आपके पास लड़ने के लिए अतिरिक्त में आपका करियर और आपकी अपनी चाहतें हैं। बेटे को कहीं और छोड़कर जॉब पर चली जाने वाली यदि आप महान हैं, तो आपको पालने के लिए कभी कोई नौकरी न करने वाली मां क्या गंवार है? फेसबुक, पढ़ाई, करियर, पद, वेतन इनमें से एक भी अच्छी माँ होने की अहर्ता नहीं है, मां के लिए ममता होना चाहिए, संतान के लिए त्याग होना चाहिए, उसके लालन पालन में आ रही कठिनाइयों का सामना करने का साहस होना चाहिए और इनमें से कोई भी तब की अम्मा में आज की मम्मी से कम नहीं था। चाहों तो जिंदगी को रिवर्स गियर में लगाओ और बचपन में जाकर उस दौर को, तब के संघर्षों को, तब की अम्मा को एक नजर देख लो। इसी बहाने अपना बचपन भी दिख जाएगा और अम्मा भी।
अम्मा! 10वीं तक पढ़ी मेरी अम्मा ने हमें उतना पढ़ाया है, जितनी आज की कई माएं न पढ़ा सकें। अम्मा ने मुझे सिलेबस की किताबें ही नहीं पढ़ाई हैं, अपने साथ बैठाकर राम—राम भी लिखवाया है। मुझे धर्म ग्रंथ पढ़ाए हैं। और ढ़ेर सारी कहानियां सुनाई हैं... अनगिनत। जिंदगी देने के साथ ही जीना भी सिखाया। जिंदगी में संघर्ष करना, चुनौतियों से लड़ना भी सिखाया। अम्मा ने हमें सिर्फ पालने में झुलाकर बड़ा नहीं किया है, अपने साथ अपने संघर्षों में भी शामिल किया है और इसलिए हम काफी नजदीक से जानते हैं कि अम्मा होना, मम्मी होना एक ही है लेकिन अम्मा होना, मम्मी से अधिक नहीं होना तो कम होना भी नहीं है। तब घरों में भोजन ही नहीं बनाना होता, भोजन के योग्य खाद्य पदार्थ खुद ही तैयार करने होते थे। अम्मा ने अपने साथ 'ढेकुली' से धान कुटवाए हैं। दाल दरने के लिए 'जात' चलवाए हैं। चटनी पीसने के लिए 'सिलवट' पर 'लोढ़ा' भी चलवाया है। 'चूल्हा' बनवाया और लिपवाया भी है, उसके लिए हम खेतों से मिट्टी लाए हैं, जिसकी सुगंध आज तक है...। उन्होंने नौकरी नहीं की है, मगर इतने तरह के महीन और मेहनत वाले कार्य आप कर पाएंगे?
अब घरों में मां-बेटे के तौलिए भी अलग हैं। हम बड़े होने के ​काफी बाद तक कहीं से खेलकर, थककर आने पर तौलिए की जगह मां के आंचल से ही पसीने पोंछते रहे हैं। कई बार तो अब भी। और स्तनपान? अभी एक रिपोर्ट आई है कि भारत की मम्मियां स्तनपान में तीसरे नंबर पर हैं। आपको पता है ? हम वर्षों तक भारत की इस मां के सीने से ही लगकर सोते और जगते रहे हैं। स्तनपान के बाद बछड़ों की तरह सिंग मारते रहे हैं और वह बस मुस्कुराती रही हैं...! हां, अपने पुत्रों के लिए आज भी बहुत कुछ करती हैं मम्मियां लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि उतना बर्दास्त कभी नहीं कर पाएंगी आज की माएं कि खुद भूखी हों, घर में अन्न का दाना न हो तब भी उनका लाडला भूखा न सो पाए।
हां, आज की मम्मी की तरह अम्मा मेरी फ्रेंड नहीं हैं, वह आज भी कल वाली मेरी अम्मा ही हैं जो गलत फ्रेंडशिप से दूर रहने की नसीहत देती हैं और अच्छे दोस्तों के साथ समय बिताने पर मना नहीं करतीं। इस बेटे ने काफी फ्रेंड बनाए हैं लेकिन अपनी अम्मा को अम्मा ही रहने दिया है। इसके बाद भी अम्मा के साथ औपचारिकताएं नहीं निभाते, न हमें आती हैं इसलिए न तो आज हमने विश किया और न ही यदि करते तो वह सुनकर थैंक्यू बोलतीं। वह बह हंस देतीं जैसा कि वह सिर्फ मेरी कॉल चले जाने पर या मुझे देख लेने पर भी करती हैं। मेरा खुश होना ही उनके लिए अशेष शुभकामनाएं हैं और मेरा चिंतित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा अशुभ।
और हां, मेरी अम्मा। आज की कुछ मम्मियों के पोस्ट यह भी हैं कि तब कि माएं कुछ बच्चों को सिखाती नहीं थीं...। आज वे अपने बच्चों को सबकुछ सिखा रही हैं— गुड टच—बैड टच भी। जी, यह बिल्कुल आसान है! खुद टीवी देखते हुए कहना कि बेटा टीवी नहीं देखना चाहिए। यह आसान है मोबाइल चलाते हुए कहना कि इससे आंख खराब हो जाएगी। बड़ा आसान है बच्चे को गुड टच, बैड टच बताना...। लेकिन बहुत मुश्किल है बच्चे के लिए इन सबसे खुद को दूर कर पाना, इन सबका त्याग कर पाना। बड़ा आसान है 'लेक्चर' से बताना; बड़ा कठिन है 'प्रैक्टिकल' कर दिखाना। तब की अम्मा ने कभी थ्योरी नहीं पढ़ाई, सच है कि हमें कहकर नहीं सिखाया क्योंकि उन्हें उसे करके बताया और बच्चे नकल बड़ी तेजी से करते हैं; हमने किया और हम सीखते गए।
यह सच है लेकिन उसके आगे भी एक सच है। अम्मा हमेशा अपने आचरण से बताती रहीं कि माएं पुत्रों के लिए क्या करती हैं, पत्नियां पतियों के लिए क्या करती हैं, बहुएं परिवार के लिए क्या करती हैं, स्त्रियां समाज के लिए क्या करती हैं, बहने भाई के लिए क्या करती हैं? और जिस नारी का जीवन ही त्याग की प्रतिमूर्ति हो, उसके लिए हमारा आचरण कैसा हो— यह बताने की भी जरूरत है क्या? हमने जो भी सीखा है, अपनी अम्मा और पापाजी से ही सीखा है और यह भी जान लीजिए कि दोनों ने ही हमें कुछ कहकर कभी नहीं सिखाया है; हमने सबकुछ उन्हें देखकर सीखा है। गुरुजी के आने पर दोनों ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। ईश्वर के सामने दोनो ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। दोनों हमें पढ़ने भेजते, हम चले जाते। हां, खेलने से मना करते तब भी चले जाते और देर से आने पर थप्पड़ पाते, रोने लग जाते और खुद ही मान भी जाते। अम्मा और पापाजी ने प्यार और कुटाई में पूरा बैलेंस रखा। बस हमने जान लिया कि गलत करो तो कुटाई होती है, सही करो तो तारीफ होती है। सही करने पर धर्म होता है, गलत करने पर पाप होता है और पाप नहीं करना चाहिए।
युग बदला है, नारियां बदली हैं, पुरुष बदले हैं, उनके चरित्र बदले हैं... लेकिन अम्मा और मेरा रिश्ता ठहरा हुआ है उसी बचपन में... जहां अम्मा की अंगुलियां छोड़ी थी; उससे एक पग भी हम आगे न बढ़े हैं। वक्त का साहस नहीं कि वह मुझे मेरे बचपन से निकाल पाए, अम्मा के आंचल से दूर कर पाए इसलिए सबकुछ बदल गया है लेकिन अम्मा वही हैं, हम भी वही हैं, हमारी बातचीत की भाषा वही है, पुट वही है... कुछ न बदला। आज फिर अम्मा के आंचल में बेटा सिमट गया है, यह वक्त वहीं जाकर ठहर गया है...।

रविवार, 6 मई 2018

अमोघ 'झूठास्त्र' की निंदा न कीजिए, प्रधानमंत्री की इस कला को नमस्कार कीजिए!


कर्नाटक में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि "महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में एक के बाद एक चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस उतनी चिंतित नहीं थी जितनी अब है क्योंकि हार उसे नजर आ रही है. मैं आपको बताऊं क्यों... क्योंकि कर्नाटक में उनके मंत्रियों एवं नेताओं ने यहां एक टैंक बनाया है. लोगों से लूटे गये धन का एक हिस्सा घर ले जाया जाता है जबकि बाकी उस टैंक में डाल दिया जाता है. टैंक पाइपलाइन के मार्फत दिल्ली से जुड़ा है, जो धन सीधे दिल्ली पहुंचाती है...."
यह देश के प्रधानमंत्री का भाषण है। वह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार का ऐसा आरोप लगा रहे हैं, जिसका कोई सबूत उनके पास नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने चैलेंज भी किया है कि यदि प्रधानमंत्री के पास सबूत है तो देश के सामने सार्वजनिक कर दें लेकिन कोई सबूत नहीं है तो सार्वजनिक क्या करेंगे? झूठ के भी भला कोई सबूत होते हैं? यदि प्रधानमंत्री के इस आरोप का कोई सबूत होता तो मोदी सरकार सीबीआई, आईटी से लेकर तमाम केंद्रीय एजेंसियों को इस काम में लगा चुकी होती और अब तक कर्नाटक सरकार के कई नेता जेल में होते। अब तक भाजपा की आईटी टीम इन सबूतों को कर्नाटक ही नहीं देश के कोने—कोने में फैला चुकी होती और कर्नाटक चुनाव कांग्रेस बिना लड़े ही हार चुकी होती। लेकिन, चूंकि ऐसा नहीं है इसलिए प्रधानमंत्री कुछ नहीं कर पा रहे। वे सिर्फ बोल रहे हैं। करिअप्पा-थिमैय्या प्रकरण के बाद वे एक बार फिर झूठ बोल रहे हैं...। सवाल है कि प्रधानमंत्री आजकल झूठ क्यों बोल रहे हैं? दरअसल, प्रधानमंत्री मजबूर हैं। इसलिए उनके अमोघ अस्त्र 'झूठास्त्र' के प्रयोग किए जाने पर उनकी नींदा न कीजिए, बल्कि उनकी इस खूबी के लिए उन्हें नमस्कार कीजिए।
प्रधानमंत्री को पता है कि कर्नाटक चुनाव जीतने के लिए न तो उनके पास विपक्ष के खिलाफ कुछ ठोस मसाला है और न ही अपना बखान करने के लिए अपनी कुछ खास उपलब्धियां इसलिए वे करें भी तो क्या? भाजपा ने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को छोड़ दिया है और उसे बचाने की सारी जिम्मेदारी अकेले प्रधानमंत्री पर। ऐसे में प्रधानमंत्री को इस चुनाव में भी आजमाना ही पड़ा है अपना अमोघ अस्त्र— झूठ। वह झूठ जो प्रधानमंत्री के मुंह से सुनते समय जनता को बिल्कुल सच लगता है। वैसे भी, भला कोई सोच सकता है कि देश का प्रधानमंत्री भी झूठ बोल सकता है? यदि किसी को संशय भी हो तो उसे दूर कैसे करे? और चुनावी सभाओं में उमड़ी एक—दो लाख की भीड़ में से यदि दो—चार लोगों ने यह प्रयास किया, सच जान भी गए तो क्या? अधिकतर भीड़ तो झूठ पर ही फिदा होगी ना? और हो भी क्यों न! अपने प्रधानमंत्री के झूठ बोलने का अंदाज ही कुछ ऐसा है कि कोई भी फिदा हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी किसी भी झूठ को इस खूबी के साथ बोलते हैं कि संदेह की गुंजाइश ही न बचे। वह इतना जोर देकर कोई बात कहते हैं कि सच जानने वाले को खुद पर ही संदेह हो जाए कि कहीं उसे ही तो गलत पता नहीं था! झूठ को सच में बदल देने की इतनी बड़ी खूबी होने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की यह भलमनसाहत ही कही जाएगी कि इस खूबी पर उनको जरा भी घमंड नहीं है। यकीन मानिए, प्रधानमंत्री झूठ बोलना बिल्कुल नहीं चाहते लेकिन वे जानते हैं कि सच बोलना उनके ही खिलाफ जाएगा, इसलिए झूठ बोलने के लिए मजबूर हैं। चार साल पहले जनता से किए उनके सारे वादे हवा हो गए हैं। नोटबंदी और जीएसटी, जिसे वे उपलब्धियां बताते थे, वही सबसे अधिक फेल साबित हुईं। ऐसे में वे बोलें क्या?
कर्नाटक चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार से लेकर तमाम प्रत्याशियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। बीजेपी ने उम्मीदवारों की जो दो सूची जारी की है, उनमें 24 ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले हैं। कई ऐसे भी हैं जो जेल तक जा चुके हैं। कट्टा सुब्रमण्यनायडू और कृष्णा शेट्टी तो भूमि घोटाले में जेल जा चुके हैं। माइनिंग माफिया जी सोमशेखर रेड्डी, जिसे बेल्लारी सिटी विधानसभा सीट से बीजेपी ने टिकट दिया है, उसे जमानत दिलाने के लिए जज को रिश्वत देने के आरोप में उसका छोटा भाई जेल गया था। अब बताइए, प्रधानमंत्री किस मुंह से कहें कि कांग्रेस ने या किसी और दल ने आपराधिक छवि के लोगों को टिकट दे दिया है? जब खुद उनकी पार्टी आपराधिक छवि वालों के साथ कर्नाटक चुनाव जीतने उतरी है? अब वे किस तरह यह सच बोलें? अपना ही कुकृत्य कैसे बोलें? इसलिए झूठ बोलना पड़ रहा है।
हां, वे चुनावी सभाओं में यह बोल सकते हैं कि देखिए केंद्र सरकार राज्यों के लिए क्या कर रही है लेकिन वह भी कैसे बोलें? कुछ करें तब तो बोलें? अभी इसी 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में कावेरी जल विवाद पर सुनवाई चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह मंगलवार तक एक हलफनामा दाखिल कर बताए कि उसने कावेरी जल विवाद को निपटाने के लिए क्या कदम उठाए हैं? जानते हैं सरकार ने क्या कहा? सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा- "कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विधेयक कैबिनेट के समक्ष रखा जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा के बाद फिलहाल कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं, इस वजह से अभी तक विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। कृपया मामले की सुनवाई 12 मई तक के लिए टाल दें क्योंकि इस दिन कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं...।" अब सोचिए, तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी के पानी बंटवारे को लेकर योजना बनाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दो माह पहले ही दे दिया था लेकिन योजना सिर्फ इसलिए लंबित है क्योंकि प्रधानमंत्री विदेश दौरों के बाद चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं? एक तरफ पानी के लिए तमिलनाडु का गला सूखा जा रहा है और दूसरी तरफ '18 घंटे देश के लिए काम' करने का दावा करने वाली सरकार कह रही है कि वह 12 मई तक कर्नाटक में प्रचार छोड़कर देश का कोई और काम करने के लिए खाली नहीं है? जाहिर है कि अब ऐसे में प्रधानमंत्री झूठ नहीं बोलेंगे तो क्या बोलेंगे?
आप भरोसा कीजिए, अपने प्रधानमंत्री झूठे बिल्कुल नहीं हैं। वे न तो अपना सच छुपाना चाहते हैं और न ही विपक्ष के बारे में झूठ बोलना चाहते हैं लेकिन वे यह दोनों काम बस मजबूरी में कर रहे हैं। आप उनकी मजबूरी समझिए और उनकी निंदा की जगह, उनके झूठ पर आंखें बंद कर यकीन करते हुए उनका साथ दीजिए। समझिए कि वे यदि झूठ बोलने के आदी होते तो हर समय बोलते लेकिन वे मजबूरी में बोलते हैं इसलिए कभी—कभार बोलते हैं। खासकर चुनावों में उनकी यह मजबूरी बढ़ जाती है। अभी एक बार फिर चुनाव है इसलिए झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आप सकारात्मक ढंग से सोचिए और झूठ के प्रयोग से किसी भी चुनाव को अपने पक्ष में करने की इस नई रणनीति के लिए मोदीजी के आभारी होइए। धन, बाहुबल इन सबसे बहुत हानि है लेकिन झूठ बोलकर वोट लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कोई खर्च भी नहीं आता। न किसी को धमकाना पड़ता है। इसलिए इसे प्रधानमंत्री की खूबी के रूप में लीजिए, और गौरव का आभास कीजिए कि ब्रह्मास्त्र के बाद झूठास्त्र का भी अविष्कार अपने ही देश में हुआ है। आप इसके प्रचार-प्रसार में शामिल होइए। प्रधानमंत्री की इस खूबी को उनकी तमाम खूबियों में शीर्ष पर रखिए क्योंकि यह खूबी इस हद तक देश के किसी भी अन्य प्रधानमंत्री में नहीं थी। हम खुद ऐसा सोचने लगे हैं कि किसी झूठ से माहौल बनाकर चुनाव जीत लेना कोई आसान काम नहीं है, यह बहुत बड़ी खूबी है। झूठ को भी अति आत्मविश्वास के साथ बोलने की प्रधानमंत्री की इस बड़ी खूबी में एक और खूबी के हम कायल हैं, वह है झूठ बोलने के विषय चयन के साथ ही उसके समय चुनाव का। वे अपने झूठास्त्र का प्रयोग हमेशा अंतिम समय में करते हैं। चुनाव से ठीक एक—दो सप्ताह पहले। वे जानते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते इसलिए वे सतर्क रहते हैं कि मतदान तिथि और उनके झूठ—तिथि में इतना अधिक फासला न हो जाए कि बीच में सच से उस झूठ का सामना हो जाए। इसी खूबी से बोले गए झूठ का परिणाम गुजरात चुनाव में दिखा था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन पर लगाए गए झूठे आरोपों के बारे में भले ही बाद में राज्यसभा में गुपचुप माफी मांग ली गई लेकिन गुजरात में सरकार तो बन गई ना? यदि चुनाव में जीत की कीमत दो—चार झूठ है तो बोलने में क्या हर्ज है? हां, ऐसा करने से प्रधानमंत्री पद की गरिमा मटियामेट हो रही है तो यह चिंता मोदी क्यों करें? उन्हें कौन-सा हमेशा इस पद पर बने रहना है। वे तो कहते ही हैं कि फकीर हैं। भाई, वे तो उठेंगे और अपने झूठ के झोले के साथ चल देंगे। समझेंगे आने वाले वे प्रधानमंत्री, जिनके सच को भी जनता चेक करेगी कि कहीं यह भी 'पिछले वाले' की तरह झूठ तो नहीं बोल रहा? वैसे भी मोदीजी का सपना प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाए रखनी थोड़ी है? उनका सपना कांग्रेसमुक्त भारत है फिर चाहे वह सच बोलने से साकार हो या झूठ बोलने से और वह सपना झूठ के जरिए सच में परिणत हो रहा है। एक—एक कर अखंड भारतवर्ष में भाजपा राज हो रहा है। हां, यह राज झूठ की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है लकिन कांग्रेसमुक्त भारत तो सच में हो रहा है ना! आप प्रधानमंत्री के झूठ बोलने की कला से जलते हैं इसलिए निंदा करते हैं; हम तो उनकी इस कला के मुरीद हो चुके हैं और इसलिए हमें तो गुजरात के बाद कर्नाटक में भी अपने मोदीजी के झूठास्त्र के सकारात्मक परिणाम की उम्मीद है...।

शनिवार, 31 मार्च 2018

समान नागरिक संहिता का वादा भी झूठ था...?


भारत के संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के रूप में दर्ज की गई है। भाजपा का मानना है कि जब तक भारत में समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता है, तब तक लैंगिक समानता कायम नहीं हो सकती है। समान नागरिक संहिता सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करती है। भाजपा सर्वश्रेष्ठ परंपराओं से प्रेरित समान नागरिक संहिता बनाने को कटिबद्ध है जिसमें उन परंपराओं को आधुनिक समय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जाएगा।"
- (भाजपा चुनाव घोषणा पत्र 2014)
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2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के तमाम बड़े लोक लुभावने वादों में से यह भी एक था— समान नागरिक संहिता। सत्ता मिलने के बाद इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया। हां, इस दौरान कानून कई बनाए। ऐसे कानून जो समान नागरिक संहिता की संभावनाओं को और दूर कर सकें। और कुछ ऐसे कानून भी जिससे भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दलों को मनमानी की खुली छूट मिल जाए। यह दल हर निगरानी, हर जांच से परे हो जाएं...।
भाजपा शासनकाल से पहले एक कानून हुआ करता था— विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010। यह कानून विदेशी कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता था यानी कि राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो अब तक ​पाक, चीन या कहीं से भी दलों के खाते में कोई राशि आने पर वह जांच के दायरे में होती थी लेकिन अब कोई जांच—वांच नहीं होगी। इसी मार्च में लोकसभा ने विपक्षी दलों के विरोध के बीच वित्त विधेयक 2018 में 21 संशोधनों को मंजूरी दी थी जिसमें एक संशोधन विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010 से संबंधित भी था। भाजपा सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेना आसान कर दिया लेकिन इतने से जी नहीं भरा। इसमें और अधिक संशोधन कर यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई कि अभी से नहीं, बल्कि 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की कोई जांच न हो। इसके लिए तारीखें तक बदल दी गईं। लोकसभा वेबसाइट के ही अनुसार, वित्त अधिनियम, 2016 की धारा 236 के पहले पैराग्राफ में 26 सितंबर 2010 के शब्दों और आंकड़ों के स्थान पर पांच अगस्त 1976 शब्द और आंकड़े पढ़े जाएंगे। पूर्व की तिथि से किए गए इस संशोधन से भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों दलों को एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया।
कुल मिलाकर, अब आर्थिक चंदे के जरिये विदेशी कंपनियों और देशों को भारतीय चुनाव को प्रभावित करने की पूरी छूट होगी। जाहिर सी बात है, जो विदेशी कंपनियां लाखों—करोड़ों रुपये दान में देंगी, उनके कुछ एजेंडे भी होंगे लेकिन इन दलों को वह राशि बताने की कोई मजबूरी नहीं होगी, न कोई जांच की जा सकेगी।
... तो बताइए, इसी कानून को मान लें ना समान नागरिक संहिता? भाजपा आई थी सत्ता में नागरिकों के लिए कानून बनाने के वादे कर, और सत्ता मिलते ही अपने हित के कानून बनाने लगी। कानून भी कैसे? जिसके जरिए देश के चुनाव में विदेशी अपनी पूंजी के बलबूते हस्तक्षेप कर सकें? अब इस कानून से तो भाजपा की देशभक्ति और पारदर्शिता दोनों ही साबित हो जाती है ना? अच्छा तरीका है... हर तरह के भ्रष्टाचार को संविधान में संशोधन कर कानून बना देना ताकि न कोई जांच हो, न कोई सवाल उठे। करने वाला पाक—साफ बना रहे।
अरे हां, कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रभावशाली लोकपाल के गठन का भी वादा किया था। वह वादा तो पूरा किया नहीं, ऐसी व्यवस्था जरूर कर दी कि अपने साथ—साथ कांग्रेस को भी 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचा लिया जिसमें इन दोनों दलों को ही एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।
वाकई, अंतर तो है...। भाजपा, भाजपा है...। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन को भुनाकर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सरकार बनाती है और सत्ता हाथ में आते ही कानून की नाव पर सवार होकर खुद ही भ्रष्टाचार का सागर पार नहीं करती, अपने साथ उस कांग्रेस को भी वैतरणी पार करा देती है...। कितनी दरियादिल है ना...। वाकई, अंतर तो है...।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

मोदीजी! याद कीजिए, एनपीए वाला वादा...


आप जानते हैं एनपीए किस बला का नाम है? अब जब यह बला आपके सिर पड़ी है तो जान ही रहे होंगे लेकिन अब भी निश्चिंत बैठे हैं तो जान लीजिए। एनपीए का फुल फॉर्म होता है— Non-performing asset। बैंक में एनपीए का सीधा मतलब वह लोन है जो बहुत बड़ा है लेकिन बैंक अब वसूल नहीं सकता। इस तरह के कर्ज अक्सर वे बड़े लोग लेते हैं जिन पर उनसे भी बड़े लोगों के हाथ होते हैं...। 
सोचकर देख लीजिए, यदि हम—आप जैसे लोग कोई लोन लेते है तो पहले तो मिलना आसान नहीं। मिल गया और चुका नहीं पाए तो उसकी वसूली के लिए बैंक संपत्ति छीन लेता है, घर गुंडे भेज देता है, वसूली के लिए खून पीने को तैयार बैठा रहता है। हिम्मत कहां हमारी कि ऋण लें और चुकाए नहीं? न चुकाने के बारे में तो छोड़िए, हम सब तो ऋण लेने से पहले ही हजार बार सोचते हैं। ... तो हम लोग जो ऋण लेते हैं, वह एनपीए नहीं हो पाते। लेकिन, बड़े लोगों की बड़ी बातें...। इसलिए वे बड़े लोन लेकर भी नहीं चुकाते। बैंक भी वसूली से हाथ खड़े कर देता है क्योंकि इन लोन लेने वालों के हाथ बहुत लंबे होते हैं, कई बार तो कानून से भी लंबे... तो इन पर हाथ कौन डालेगा? लालच या बड़े दबाव में बैंक इस तरह के लोन देता है और फिर लालच या दबाव में ही आकर लोन वसूल पाने में अक्षम हो जाता है तब इसे एनपीए की श्रेणी में डाल देता है। यानी यह एक पूंजी हो जाती है, जिसके हमारे पास सिर्फ आंकड़े होते हैं लेकिन इसका देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं होता बल्कि नुकसान होता है...।
भारतीय अर्थव्यवस्था को जमीन पर ला पटकने वाले इस एनपीए का आंकड़ा भी बताते हैं लेकिन उसके पहले 2014 के चुनाव में भाजपा द्वारा इस बारे में की गई यह घोषणा तो पढ़ लीजिए—
""साल दर साल एनपीए की मात्रा बढ़ती जा रही है। पिछले कई वर्षों से ऐसा हो रहा है। भाजपा ऐसे कदम उठाएगी जिससे बैंकिंग क्षेत्र में एनपीए में कमी आए। भाजपा एक ऐसा मजबूत नियामक निकाय बनाएगी जो गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से निवेशकों की रक्षा करेगी...।""
भाजपा के घोषणापत्र में एनपीए के जिक्र और इस संबंध में की गई इस घोषणा का मतलब है कि भाजपा को सत्ता में आने से पहले ही मालूम था कि एनपीए कितनी गंभीर समस्या है लेकिन सत्ता में आने के बाद सरकार न जाने किन कार्यों में व्यस्त हो गई कि अपनी सारी घोषणाओं की तरह यह घोषणा भी भूल गई। करना था सदाचार, बढ़ता गया भ्रष्टाचार...। जिन क्षेत्रों में विकास के दावे किए, उनमें तो हुए नहीं, लेकिन एनपीए का विकास खूब हुआ। एक ताजा आंकड़े के अनुसार, डूबे कर्ज के मामले में भारत इस समय दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के नीमच निवासी चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है उसके अनुसार, देश का संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए)7,76,067 करोड़ रुपये है। इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपये निजी बैंकों के हैं. पौने आठ लाख करोड़ रुपए यूं ही कुछ लोग ले गए।
समझते हैं न कि पौने आठ लाख करोड़ में कितने शून्य लगेंगे? यह पैसा अब देश में नहीं है, न देश के किसी काम आएगा... फिर भी यह कोई घोटाला नहीं है। इस सरकार की तारीफ में आप सब सही कहते हैं, बाकी सरकारों और इस सरकार में अंतर तो है इसलिए तो इस सरकार में घोटाला करने और उसे ढ़कने के तरीके भी अलग तरह के हैं। सरकार भगोड़ों से रुपये तो वसूल नहीं पा रही तो एनपीए कम करने के लिए आपके—हमारे टैक्स से भरे रुपए इनके अब खाते में जमा कर रही है। यह हम यूं ही नहीं कर रहे। 'बिज़नेस स्टैंडर्ड' का आंकड़ा देख लीजिए। 38 विलफुल डिफॉल्टरों के 500 करोड़ रुपये का एनपीए write off कर दिया गया है। इसका मतलब समझते हैं? इसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने अपने मुनाफे से एनपीए के खाते में पैसा डाला और इस कारण एनपीए के खाते में नुकसान कम दिखने लगा है। कुल छह बैंक ऐसे हैं, जिनमें 60,000 करोड़ से ज़्यादा रकम डाली गई है। यह 60 हजार करोड़ रुपये सरकार के हैं, यानी जनता के हैं। इसका मतलब यह कि लुटेरे देश का खजाना लूटकर गायब हो गए और देश की जनता से टैक्स वसूलकर भरे गए सरकारी खजाने से सरकार उसकी भरपाई कर रही है। यानी दोनों तरफ से लूट। वाकई, यह सरकार बेमिसाल है। अंतर तो है...।

बुधवार, 28 मार्च 2018

जब गड्ढों से गुजरते हुए चिकनी सड़क की खबरें पढ़ रहे हों तो समझ जाना...


"हाय, मैं नरेंद्र मोदी हूं और मैं देश का पीएम हूं। जब आप मेरे नमो एप में साइन अप करते हैं तो मैं आपका सारा डाटा अपने अमेरिकी कंपनियों के दोस्तों को दे देता हूं...।"
"हाय मेरा नाम राहुल गांधी है और मैं देश की सबसे पुरानी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। जब आप हमारे आधिकारिक एप पर साइन अप करते हैं तो मैं आपकी सारी जानकारी सिंगापुर में अपने दोस्तों को दे देता हूं...।"

दरअसल, यह दोनों ही ट्वीट आरोप कम, सच्चाई अधिक हैं। इन चार वर्षों में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी ने ठीक से अपना काम नहीं किया है। सत्ता पक्ष अपने वादे पूरे करने में नाकाम है तो विपक्ष उसकी मनमानियां रोकने में नाकाम रहा है। अब दोनों को पुन: सत्ता की लालसा है। ऐसे में, षड्यंत्र ही एकमात्र सहारा है। यह सब करने के लिए एक तरफ आवारा पूंजी का सहारा लिया जा रहा है तो दूसरी तरफ सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है। इस षड्यंत्र में सभी दल शामिल हैं इसलिए ठोस तरीके से कोई किसी का विरोध नहीं कर रहा। धरातल पर जनता से कट चुकी यह पार्टियां अब सोशल साइट पर उनसे जुड़ना चाहती हैं। भाजपा सरकार ने तो सभी सांसदों को ट्विटर पर फॉलोवर बढ़ाने और सभी एनसीसी जवानों को नमो एप डाउनलोड करने का भी फरमान तक जारी कर रखा है। हां, यहां फिर वही बात लागू होती है, जो मैंने कही थी। दोनों ही दल बेशर्मी पर उतर आए हैं लेकिन कांग्रेस डरती है और भाजपा डराती है...। नमो एप और राहुल गांधी एप के जरिए जनता की जानकारी जुटाने का मामला उजागर होने के बाद कांग्रेस ने जहां गूगल एप से राहुल गांधी एप को डिलीट​ कर दिया वहीं भाजपा ने नमो एप को जारी रखा है क्योंकि वह चोरी ही नहीं करती, सीनाजोरी भी करती है...।
आप क्या सोचते हैं? आप—हम किसी के प्रशंसक नहीं हैं? लेकिन उसकी प्रशंसा में रोज कितनी पोस्ट लिख पाते हैं? यह सोचिए ना कि हम खुद अपने पेज पर अपने ही बारे में कितना लिख पाते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि यह कौन से प्रशंसक हैं जो इन नेताओं के नाम पर चलने वाले फैन पेज पर 24 घंटे पोस्ट अपडेट करते हैं? आखिर वे इसके अलावा करते क्या हैं? और कुछ और नहीं करते तो उनका खर्च कैसे चलता है? दरअसल, फैंसपेज जैसा कहीं, कुछ भी नहीं है। सबकुछ पेड है। यह अरबों के झूठ—फरेब का कारोबार है। आप आरटीआई से इस बारे में जानकारी मांगिए तब भी आपको सूचना नहीं मिलेगी लेकिन सच यही है कि कुछ मीडिया समूह अपने पत्रकारों के वेतन पर जितना खर्च नहीं करते, उससे अधिक खर्च भाजपा की आईटी सेल अपनी प्रशंसा लिखने वालों पर करती है। आईटी सेल के बंदों का वेतन भी कमोबेश पत्रकारों से अधिक है। अभी देश की राजधानी में भी एक नौसिखिए पत्रकार का वेतन 8 हजार से शुरू है लेकिन राजनीतिक दलों के आईटी सेल को ज्वाइन करने वाले बंदे को 15—20 हजार आराम से मिल जाते हैं। अखबार में एक संपादक का वेतन 60 हजार से अधिकतम 2—3 लाख तक पहुंचेगा, लेकिन आईटी सेल के प्रमुख का वेतन कुछ भी हो सकता है। उपर से सत्ता का संरक्षण अलग से। फर्जी फैंसपेज, फर्जी न्यूज पोर्टल, फर्जी सोशल एकाउंट्स... इन सबका कारोबार इतना बड़ा है कि चंद अच्छे पत्रकार लिखते—लिखते मर जाएं लेकिन ये सब मिलकर किसी भी सच को झूठ बना दें और किसी भी झूठ को सच। भाजपा ही नहीं, इस कारोबार में सभी दल शामिल हैं। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल... सभी को चमकाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। जिस दल के पास आवारा पूंजी अधिक है, जिसके पास सत्ता है, वह उसका सबसे अधिक दुरुपयोग कर रही है। चूंकि हमाम में सभी नंगे हैं इसलिए कोई इस षड्यंत्र के खिलाफ आर—पार की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बस इस तरह से आवाज उठा रहा है कि कहीं राज खुल जाए तो आगे वह कह सके कि मैंने तो कहा ही था...।
इस गरीब देश में जहां कई लोगों को खाने के लिए अनाज ठीक से नहीं मिल पा रहा, लाइक के नाम पर करोड़ों के वारे—न्यारे हो रहे हैं। इन पर होने वाले खर्च का किसी के पास कोई हिसाब नहीं है और न आप सवाल कर सकते हैं कि यह धन आ कहां से रहा है? चूंकि भाजपा ने पहले ही वह कानून बना दिया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली राशि किसी को बताई नहीं जाएगी तो आप पूछ भी नहीं सकते। बस...। अब आप वहीं सुनिए जो सुनाया जाए, वहीं देखिए जो दिखाया जाए...। यह भ्रमजाल इतना बड़ा है कि कब आप इसकी चपेट में आ जाएंगे, आप भी समझ नहीं पाएंगे। हां, टूटी सड़क पर चलते हुए भी यदि आप हाथ में मोबाइल लेकर चिकनी सड़क की खबर पढ़ते हुए आगे बढ़ते जाएं और आप जिस सड़क पर हैं, उसी के गड्ढे न दिखाई दें तो समझ जाइए कि आप इस कारोबार का हिस्सा बन चुके हैं। तब आप यदि इस भ्रम जाल से बचना चाहते हैं तो मोबाइल पॉकेट में रखिए और सड़क की तरफ देखिए... यानी आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविकता में लौट आइए। हां, यदि तब भी आपकी भक्ति कायम हैं तो यकीन मानिए आप कोई भक्त—वक्त नहीं हैं, आप मूर्ख बन चुके हैं! फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वेबसाइट, एप पर अरबों रुपए पानी की तरह बहाने वाले राजनीतिक दलों का बस यही एक उद्देश्य भी है— सभी को मूर्ख बनाना। एक ऐसा आभासी आवरण तैयार कर देना कि आंखें खुली रहें लेकिन सामने से वास्तविकता ओझल हो जाए...।

शनिवार, 24 मार्च 2018

कैडर... जिनपर भाजपा को नाज है...


भाजपा ने इन चार सालों में इतने काम कर दिए हैं कि कैडर वोटरों के पास अब अपने आस-पास के लोगों के सवालों के जवाब नहीं हैं। इस तरह भाजपा ने अपने कैडर वोटर तो नहीं खोए हैं लेकिन निःस्वार्थ लाखों 'प्रचारक' खो दिए हैं। 
हर आदमी न तो सरकार से सवाल करता और न ही हर आदमी के सवाल का जवाब सरकार देती है। चौक-चौराहों पर चाय पीते हुए, सड़क पर चलते हुए, ऑफिस में काम के बीच में जो सवाल निकलते हैं और उनके जवाब वहीं नहीं मिलते हैं तो आदमी को खटकने लगता है। न सरकार, न दल, न नेता, न कार्यकर्ता... यह कैडर वोटर ही होते हैं जो दूसरे वोटरों के सवालों का तत्क्षण मौके पर ही जवाब देकर उनका मुंह ही बंद नहीं कराते बल्कि उनपर उस दल, नेता, और उस विचारधारा का प्रभाव भी छोड़ जाते हैं लेकिन अब कैडर वोटर ही बाकी वोटरों से बचकर निकलने लगे हैं...।
यह कैडर वोटर बिल्कुल जमीन पर होते हैं और उनसे विचार-विमर्श, बहस करने वाले भी इसलिए इनके सवाल भी जमीन से जुड़े होते हैं और कैडर के जवाब भी। दुर्भाग्य है कि इन 4 वर्षों में भाजपा ने कुछ काम भी किए हैं तो जमीन पर रहकर नहीं, हवा में उड़ते हुए। इस कारण जमीन पर न कोई काम दिखता है, न कैडर वोटर को जमीन से जुड़े सवालों का जवाब सूझता है। वह भाजपा के प्रति समर्पित है जी-जान से... उसका दिल साफ है... वह पार्टी को दिल से चाहता है... उसे किसी पद, वेतन, सत्ता की इच्छा नहीं लेकिन वह नहीं चाहता कि वह जिसे चाहता है उसके बारे में कोई बुरा कहे। इसलिए वह किसी से भी लड़ पड़ता है लेकिन अब वह खुद से लड़ने लगा है। वह किसी नरेंद्र मोदी जैसे नाम से भी अधिक समर्पित है इस दल के लिए लेकिन वह वोटर है, नेता नहीं। वह जमीन से जुड़े अपने भाइयों के सवालों के जवाब थेथरई से नहीं दे सकता और जवाब है नहीं, इसलिए जो कैडर भाजपा को कुछ बोलते ही बरस पड़ता था, अब वह चुप रहने लगा है, वह कैडर जिसके पास सबके सवालों के जवाब थे, वह अब निरुत्तर होने लगा है... वह जो भाजपा और उसके नेता के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता था, वह अब उनको दी जा रही गाली भी सहन करने लगा है...।
हाँ, यह कैडर वोटर अब भी भाजपा के साथ है लेकिन अब वह अपने आस-पास के लोगों से अपने साथ चलने के लिए नहीं कह रहा। वह जो हर पल चहकता था, अब अकेले गुमशुम रहने लगा है...। वह जिसे कारवां पसंद था, अब अकेले चलने लगा है...। वह जिसकी जुबान पर सबके सवालों के जवाब होते थे, अब वह मन ही मन खुद से सवाल करने लगा है... मैं रुक क्यों नहीं रहा? मैं क्यों चल रहा हूँ? कैडर रुका नहीं है, थका नहीं है, अब भी चल रहा है लेकिन अब उसके पास अपने ही सवाल का जवाब नहीं है...।